आज का क्षत्रिय

आज का क्षत्रिय

हम सभी ने पौराणिक युद्ध कथाओं मे एक शब्द का उल्लेख बहुत देखा है, वह है “क्षत्रिय धर्म​” । इस शब्द की रचना के अनेक स्रोत मे से एक है “क्षत्र“, अर्थात वो जो रक्षा करे ।

भगवत गीता ( 18:43 )
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् |
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ||
अर्थ - शौर्य, पराक्रम, पराक्रम, शस्त्र विद्या में निपुणता, 
युद्ध से कभी पीछे न हटने का संकल्प, परोपकार में बड़प्पन 
और नेतृत्व क्षमता, ये क्षत्रियों के लिए काम के स्वाभाविक गुण हैं।

कथा​ओं मे क्षत्रिय धर्म का वर्णन का सम्बन्ध सीमा सुरक्षा, युद्ध कौशल, वीरता एवम रजकीय निर्णय से था । और क्षत्रिय कुल ने सदैव इन सभी उत्तरदायित्व का निर्वाह किया ।

परन्तु जब हम इस परिभाषा को आज के परिपेक्ष मे देखते है तो एक भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है । एक छोटॆ समुह को तो सेना मे अवसर मिल जाता है परन्तु उस विशाल वर्ग का क्या जो आज समाज मे निरुत्तर सा खड़ा है क्योंकि क्षत्रिय समाज के परिवरों मे आज भी पालन पोशन वही है जो कई शतक पहले था । वो सभी क्षत्रिय गुन होते हुए भी आज समाज मे पीछे रह गया, क्योंकि कार्यालयों में शौर्य नहीं चहिये, पुस्तकालय में युद्ध कौशल का कोइ लाभ नहीं तथा अध्ययन में रक्त नहीं बहाना ।​

वो कभी अन्य सी जाति बनकर आरक्षण माँग लेता है, तो कभी अपनी महानता खोजता पूर्वजो का स्मरण कर लेता है । कभी उसका स्वभिमान समाज के चलन से टकराता है, तो कभी समकालीन गुणों कि कतार मे स्वयम को सबसे पीछे पाता है ।

तो भविष्य क्या है ?

भगवत गीता ( 18:41 )
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप |
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै: ||
अर्थ - ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के कर्तव्यों को 
उनके गुणों के अनुसार वितरित किया जाता है, उनकी 
योग्यता के अनुसार (और जन्म से नहीं)।

क्षत्रियों को अपने कर्मों में परिवर्तन लाना होगा और क्षत्रिय धर्म के मूल को यथावत रखते हुए चलना होगा । हमे क्षत्रिय धर्म कॊ अपने गुणों मे पुनर्जिवित करना होगा जिसक एक मात्र विकल्प है ज्ञानार्जन

हमे युद्ध भूमि के स्थान पर कर्म भूमि मे उतरना होगा, सीमा सुरक्षा नही अपितु दुर्बल के हितो कि रक्षा करनी होगी । शस्त्र का अभ्यास नही, शास्त्र का अध्ययन करना होगा । पूर्वजों की स्मृति की छाया नही, स्वयं के परिश्रम की धूप में जलना होगा । छद्म अभिमान नही, विनीत मन से सेवा करनी होगी । त्रुटि कि तत्पर्ता नही, विश्लेषणात्मक बुद्धि का परिचय देना होगा ।

अपने क्रोध का पालन नहीं, अपने ज्ञान का वर्धन करना होगा ।

तू जड़ नही, तू मर नही, तू धीर हो चल डर नही,
तू प्राण बन, तू तेज बन, तू मौन सा दिनचर नही
तू ज्ञान गंगा का पान कर, प्रत्येक वर्ग का मान कर
तू मानको को दे दिशा, न्यायी युग का निर्माण कर
– जयेन्द्र​

Published by Jayendra Singh

I am a political enthusiast, learner and a follower of Dharma. I have written number of opinions, observations and analysis. I write as right leaning centrist with topics related to Dharma and political situation in India.

6 thoughts on “आज का क्षत्रिय

  1. Profusion of wisdom speaks in your blog. Sorted and on point. All the best for your new innings.

  2. Bahut hi gyanbadhak he ese hi lkhte raho हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है

  3. Change is the only constant and painful also.
    क्षत्रिय needs to accept the change and should be open to change themselves else History would have us as Brave,Committed and more importantly vanished because of their own non compromising attitude.
    Lets be flexible and supportive to own communities so as to sustain and flourish.

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